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Showing posts from May, 2009

A dewdrop on the petal of time

Only sorrows I garnish, like a tear drop on the lips of time.
Doomed at first light to vanish, I'm a dewdrop on the petal of time.

My ghazals shall be sung long after me, they shall nurture many loves,
Though my being shall perish, like a dewdrop on the petal of time.

My entreaties, my pleadings are to you nothing, words written on sand
Which the first waves shall vanquish, like a dewdrop on the petal of time.

My love seems ephemeral, cursed to be forgotten, a love that no
Generations shall cherish, like a dewdrop on the petal of time.

When you've burnt the last verse in my last ghazal, then my love shall die, then
This 'Wandering' shall finish, like a dewdrop on the petal of time.

Mahim Bay from Rangsharda, Bandra

Bay encased in concrete,
the orange dying above,
and a silver sea turns grey;
the waves crash futilely
against the Mahim fortress -
a little outpost of the past
- where I suppose the crash
of waves might,
on careful listening,
recreate the clash of
steel versus steel;
the boats bobbing by the
fallen ramparts,
signs of life that
probably,
lives in another time-warp,
of an eternal poverty
dependent on
the wealth of the sea;
Out there the great sea-link,
a marvel of modern
engineering, its cranes
hastening to completion;
above thhe clouds thicken,
monsoon hangs tense in the
air - a forebear of
things to come when
nature shall triumph over
men again;
and in the shanties of Bandra,
in the towers of Worli, and
in the middle-classness of
Mahim,
the lights come on
one by one -
A Cezanne waiting to be
painted -
a dying day, a sleepless city.

न लगे शेर ख़त्म हुआ

कभी वाह वाह मत करना, लगता है शेर ख़त्म हुआ|
कभी इरशाद मत माँगना, लगता है शेर ख़त्म हुआ|
इन ख़ाना बदोश अल्फ़ाज़ों को मचलते रहने दो,
तुम भी कुछ लफ़्ज़ पिरोना, न लगे शेर ख़त्म हुआ||

यह कृति उमर बहुभाषीय रूपांन्तरक की मदद से देवनागरी में टाइप की गई है|

किस्सों की झोली

हर मन्ज़र क़ैद करती, मेरी किस्सों की झोली|
कुछ भूलने न देती, मेरी किस्सों की झोली|
उम्र बढ़ेगी, दोस्तों का साथ छूटेगा जब,
तब यही साथ देगी, मेरी किस्सों की झोली||

यह कृति उमर बहुभाषीय रूपांन्तरक की मदद से देवनागरी में टाइप की गई है|

चिराग़ लिए भटक रहा हूँ

इनसानों की दुनिया है, फिर भी लगती है इनसानियत बेहोश,
हर आदमी ग़ाज़ी बन गया है, बिना सोचे मरने को सरफरोश,
मैं चिराग़ लिए भटक रहा हूँ, दर उल अमन कहाँ मिलेगा,
ख़्वाबों की देहलीज़ कब कहेगी, पनाह में आ जाओ 'ख़ाना बदोश'?

यह कृति उमर बहुभाषीय रूपांन्तरक की मदद से देवनागरी में टाइप की गई है|

बूँदें

आसमान में है, हवाओं में है,
आज बरसेगी, फ़िज़ाओं में है| 2
सूरज ढका है, रौशनी मन्द है,
बूँदों का वायदा, बादलों मे‍ है| 2

परिन्दे चुप हैं, सिर्फ कोयल गा रहे हैं,
ऐ काले बादल, कब वायदा निभाओगे?
पत्ते नसीम में इस आस से झूम रहे हैं
ऐ जान देने वाले पानी कब बरसोगे?

आसमान में है, हवाओं में है,
आज बरसेगी, फ़िज़ाओं में है| 2
सूरज ढकी है, रौशनी मन्द है,
बूँदों का वायदा, बादलों मे‍ है| 2

दिन बढ़ी, बादल बिखरे, सूरज फिर भड़का,
"मैं आसमान का मीर, मुझे क्या छुपाओगे?"
प्यासे बीज गिड़गिड़ाते हैं, "ऐ धोकेबाज़,
सावन आ गया, और कितना सताओगे?"

आसमान में है, हवाओं में है,
आज बरसेगी, फ़िज़ाओं में है| 2
सूरज ढकी है, रौशनी मन्द है,
बूँदों का वायदा, बादलों मे‍ है| 2

आँखों में यह आस बनी रही कि आज तो
क़ौस ए क़ज़ा लाए सात रंगों का सरगम |
शाम ढलकर रात हुई, तब अब्र घने हुए,
आखिर बूँदें गिरीं, मद्धम, मद्धम, मद्धम |

यह कृति उमर बहुभाषीय रूपांन्तरक की मदद से देवनागरी में टाइप की गई है|

ग़ैर

दुश्मन मेरा कोई नहीं, दोस्तों के बग़ैर हूँ;
एहसान मेरा सब पर है, प‌र पनाह के बग़ैर हूँ;
बद्दुआ है कि मैं फिरता रहूँ 'ख़ाना बदोश'...
किसि शहर से ग़ैर नहीं, हर शहर में ग़ैर हूँ |

यह कृति उमर बहुभाषीय रूपांन्तरक की मदद से देवनागरी में टाइप की गई है|

त्वमेव त्वमेव असु असि

तव नाम्नः जपम् करोमि, त्वमेव त्वमेव वसु असि |
तव रूपस्य ध्यानं करोमि, त्वमेव त्वमेव असु असि ||

निष्ठुरशब्दाः तव मुखे सुगन्धि भवन्ति, किम् खादसि?
तव आमोदे सदा मुह्यामि, त्वमेव त्वमेव असु असि ||

मिथ्याहेतु मन्दस्वरेण अद्भुताख्यानानि कथयसि त्वम् |
मधुरवाणीम् नित्यम् शृणोमि, त्वमेव त्वमेव असु असि ||

निष्फलारण्य तव संनिधौ निःशेषकुसुमिन भवति |
सर्वत्र त्वाम् अवलोकयामि, त्वमेव त्वमेव असु असि ||

संमृशामि नभः मम अनुरागान् अङ्गीकरोषि यदा |
मन्मथेन जगते मुच्छामि त्वमेव त्वमेव असु असि ||

ददासि हस्तात् यम् आपस्तोक‌म् अस्ति भावित अमृतबिन्दु |
तव अनुकम्पायै तृष्यामि, त्वमेव त्वमेव असु असि ||

या अन्येभ्यः शीर्ण‌वासना, मम चक्ष्वोः अनुजीवति |
सर्वदा स्मरामि रामेशः, त्वमेव त्वमेव असु असि ||

एषः कृति उमर बहुभाषीय रूपांन्तरक उपकारेण‌ देवनागर्याम् टङ्कित अस्ती|

Published in Amaravati Poetic Prism 2017
ed. Padmaja Iyengar,
Cultural Centre of Vijayawada & Amaravati

Towards a ghazal, but not there yet

I meditate upon your name, you alone are the wealth of life.
I meditate upon your form, you alone are the breath of life.

Inhumane words become sweet-scented in your mouth, what do you eat?
I'm entranced by your fragrant breath, you alone are the breath of life.

Deceptively, in hushed tones you narrate the most fabulous tales.
I'm always hearing your sweet voice, you alone are the breath of life.

The barren forest in your presence becomes endowed with flowers.
I can perceive you everywhere, you alone are the breath of life.

I reach up to the heavens when you consent to my entreaties.
Love liberates me from the world, you alone are the breath of life.

The water which you give me out of your hands is ambrosia.
I'm thirsting for your compassion, you alone are the breath of life.

What is to others a shattered memory, lives on in my eyes.
Raamesh remembers forever, you alone are the breath of life.

(This is not a ghazal because though there is a radeef, and those who know better than me may …

अल्फ़ाज़ का सौदागर

मैं सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का सौदागर हूँ,
वह अल्फ़ाज़ जिन्हे ख़रीदनेवाला
बाग़ान की पगडन्डियों में
अज़ाद करता है;
पर जो मुकाम की तलाश में
तितलियों की तरह मन्डराती
रहती हैं 'ख़ाना बदोश',
पनाह की खोज में भटककर
फिर मेरे ही पास लौट आती कैं,
और मैं उन्हें फिर बेच देता हूँ|

यह कृति उमर बहुभाषीय रूपांन्तरक की मदद से देवनागरी में टाइप की गई है|

Sonnet for Karbala

I call out from the grand mosque's slim minaret,
"Allahu Akbar, faithful come to prayer"
At Karbala, site of the Imam's slaughter,
Where Muslims come to repent their sins, regret.
But is our ancient, austere religion yet
Ours to practice, free from haunting fear?
For I'm afraid, on the streets walks a slayer,
He rules the land with machine gun and bullet.

From the time when Baghdad was founded by flames,
The chants of prayer have merged with those of death,
It was not enough that one Hussein had bled.
Greeks, Mongols, Americans shall press their claims,
Fools shed blood in this land until their last breath,
Iraq shall come to peace, when all men are dead.

Paper

The Arabs have a word for it
— they call it maqtāb —
pieces of paper that say
you are a
CEO, Field Marshal, Minister of
Railways.
Shelley called them shadows
not substantial things...
Swift said they were bubbles
raised by breath of kings.

What immense power, what glory,
what awe...
buttressed by a signature and
a stamp...
...of another who holds a piece
of paper for himself.

Paper burns, paper crumbles.
Paper dissolves in water.
Or someone can tear paper
...or sign another paper that
says your maqtāb is no more.

Then boast no more your
mighty deeds...
gather your books, your
laptop-bag, the trinkets you
have accumulated and go
home —
fallible, fallen.

The Capital Sonnet

It's said when stubborn it is strong,
Thus swollen it will pick a fight.
Buried in sand it knows no wrong,
That's when it is not screwed on right.

When it's in love, it's over heels,
No sense can be drilled in at all.
It will claim none knows what it feels,
Till the rest bang theirs on a wall.

At times of pride it is held high,
Yet it must roll when fault is found.
It's the seat of reason but why
Do pretty faces turn it round?

The sanctum of our existence,
Yet bodyless, it makes no sense.

आह-ए-ग़ज़ल

दीपक का मुरझाता नूर कह रहा है, यह आह-ए-ग़ज़ल सुन लो;
सूरज की मरती किरनें कह रही हैं, यह आह-ए-ग़ज़ल सुन लो |

झोंका न जाने कैसे तेरी ज़ुल्फ़ों की महक ले आता है,
यह हवाएँ चुपके से कह रही हैं, यह आह-ए-ग़ज़ल सुन लो |

सावन के हर धुन्धले परछाई में तेरा ही एहसास मौजूद है,
मद्धम बारिश की बूँदें कह रही हैं, यह आह-ए-ग़ज़ल सुन लो |

नदी के आब ए सफ़ा में तेरा ही चेहरा दिखता है मुझे,
दरिया की यह लहरें कह रही हैं, यह आह-ए-ग़ज़ल सुन लो |

चहचहाते परिन्दे तेरी ही अवाज़ की याद दिलाते हैं,
जंगल की पगडन्डियाँ कह रही हैं, यह आह-ए-ग़ज़ल सुन लो |

मंज़िल की तलाश में निकल चुका हूँ, महक है पर फूल कहाँ,
यह मनडराती तितलियाँ कह रही हैं, यह आह-ए-ग़ज़ल सुन लो |

यह 'ख़ाना बदोश'अल्फ़ाज़ भटक रहे हैं बहर की तलाश में,
सियाही की लकीरें कह रही हैं, यह आह-ए-ग़ज़ल सुन लो |

यह कृति उमर बहुभाषीय रूपांन्तरक की मदद से देवनागरी में टाइप की गई है|

Kosovo Polje

Who stood at Kosovo Polje?
Who heard the guns at Waterloo?
who remembers those days today,
to bear the rancour this day too?

The time we were meant to forget,
the writer's pen traps it in ink.
We read much but we do not think,
and contrived hatred we beget.

None lives who saw the mad work done.
But mention an imagined past,
None hesitate to pick a gun
And swear to defend to the last.

The last who remember are dead
We rush to take their place instead.

Published in Remember, ed. Paragram; Four Point Press, Shepperton, 2014. ISBN: 978-0-9927123-2-7.

Reposting तुमसे मिलने से मुकर जाता हूँ

दो पल का साथ फिर ज़िन्दगी तन्हा, तुमसे मिलने से मुकर जाता हूँ|
दर्द फुग़ान हो जाने का डर इतना, तुमसे मिलने से मुकर जाता हूँ| 1

हवाएँ चुपके से कहती हैं कि मिलन की रुत आई तुम कहाँ हो,
पर तुमसे बिछडने का डर इतना, तुमसे मिलने से मुकर जाता हूँ| 2

तुम आओगी, बोलोगी, हँसोगी, बडबडओगी, चली जाओगी,
रुख़सत में तड़पने का डर इतना, तुमसे मिलने से मुकर जाता हूँ| 3

मेरे साँसों में अपनी ख़ुशबू छोड जाओगी, वह बहकाता रहेगा,
उस याद में सिसकने का डर इतना, तुमसे मिलने से मुकर जाता हूँ| 4

घर आओगी तो बातें मत करना, दीवारें सुनकर देर दोहराएँगी,
वह गूँज सुनकर रोने का डर इतना, तुमसे मिलने से मुकर जाता हूँ| 5

किसी चीज़ को हाथ मत लगाना, मेरा इबादतख़ाना भर गया है,
यह इख़लास चूकने का डर इतना, तुमसे मिलने से मुकर जाता हूँ| 6

नज़राने मत दिया करो, शुक्रिया कहना मेरे बस की बात नहीं,
ज़िन्दगी कम पडने का डर इतना, तुमसे मिलने से मुकर जाता हूँ| 7

तुम्हारी याद से पैर ज़मीन पर नहीं टिकते, तुम्हारा दीदार तौबा,
ख़्वाब टूटकर गिर जाने का डर इतना, तुमसे मिलने से मुकर जाता हूँ| 8

हलकी बारिश की बूँदें फिर तुम्हारी आँसुओं की याद दिलाती हैं,
इन्हें न सम…